रक्षाबंधन ७ अगस्त २०१७, सन्दर्भ कथाएं

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रक्षा बंधन का पर्व सावन के शुक्ल पक्ष के पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है.

इस दिन बहन भाई के  कलाई पर रक्षासूत्र बांधती है और भाई के सुखी जीवन की  कामना करती है। बदले में भाई अपने बहन की सारी उम्र  रक्षा करने का बचन देता है। इस पवित्र रक्षा बंधन के त्यौहार  पर भाई के कलाई पर रक्षा बांध कर बहन  उसे मिठाई खिला कर सुबह और मंगल की कामना करती है . भाई बहन रक्षा का बचन देता है और साथ ही बहनों को कुछ उपहार  भी देता है .

rk1आपसी खून के रिश्ते वाले भाई बहन तो इस पवित्र बंधन के उत्सव को मानते ही हैं. जिनलोगों के मुँहबोले भाई बहन का संबंध होता है वो लोग भी इसे मानते हैं और बहने उतनी ही खुसी से अपने भाइयों के कलाई पर राखी बांधती हैं।
रक्षा वंधन यानि रक्षा करने के लिए बंधन। भाई के कलाई पर बांध हुआ रक्षा सूत्र एक जिम्मेवारी के याद दिलाता है.rk3

        रक्षाबंधन का त्यौहार क्यों मनाया जाता है।

१)इन्द्र और शची की कथा

भविष्य पुराण में वर्णित कथा के अनुसार एक बार देवता और दानवों में भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में इंद्रा शक्तिशाली दैत्य बलि के द्वारा पराजित हो गए। इंद्रा की पत्नी शची  ने  विष्णु की आराधना की और विष्णु प्राप्त रक्षा सूत्र को  अपने पति इंद्रा के कलाई पर ("असुरों पर विजय की कामना") से बाँध दी। इससे इंद्रा ने बलि और दैत्यों पर  विजय पाने में सफलता प्राप्त की। रक्षा सूत्र ने युद्ध में इन्द्र की रक्षा की थी अतः लोगों ने इसे विजय का प्रतिक मानकर  उत्सव के रूप में अपना लिया|

२) राजा बलि  और देवी लक्ष्मी की कथा

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भागवत पुराण में वर्णित कथा के अनुसार बलि के दान यज्ञ में भगवन विष्णु ने बलि से  तीन पग जमीन मांगी थी पूजन अर्चन करने के लिए। बलि भगवान को पहचान न पाया और उसके सारे राज्य और समस्त लोको को भगवान २ पग में ही हरण कर लिए. तीसरा पग रखने के लिए जगह नहीं बचा। दानवीर बलि ने दान भंग न होने पाए अतः तीसरे पग के लिए अपना पीठ फैला दिया।

महादानी बलि से प्रसन्न होकर विष्णु ने उसे पाताल लोक का  राजा बना दिया और वर मांगने को कहा। वरदान में बलि ने भगवान विष्णु को अपने यहाँ द्वार पर विराजमान रहने के लिए वर मांग लिए। अब अपने दिए गए वरदान के कारण भगवान् विष्णु वही रहने लगे. इधर माँ लक्ष्मी अपने स्वामी की काफी दिनों की प्रतीक्षा करने के बाद व्याकुल हो उठीं। तभी नारद जी माँ लक्ष्मी के पास आये। उन्होंने सारा वृत्तांत लक्ष्मी जी को सुनाया और इससे उबरने का उपाय भी बताया। नारद जी के कहे अनुसार माँ लक्ष्मी एक रक्षासूत्र ले कर राजा बलि के यहाँ पहुंची और बलि के कलाई पर राखी बाँध दी। राखी बंधने पर दैत्य राज बलि बहुत खुस हुए। बलि ने इसके लिए अपने बहन लक्ष्मी जी को उपहार स्वरुप कुछ मांगने को कहा। उपहार में लक्ष्मी जी ने अपने पति विष्णु को मांग  लिया और भगवान विष्णु के साथ माँ लक्ष्मी वैकुण्ठ धाम चली आयीं।

रक्षासूत्र बंधने का मंत्र ->
येन बद्धो बलि राजा दानवेन्द्रो महाबलः
तेन त्वम् प्रतिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल

3) रक्षाबंधन कृष्ण और द्रौपदी

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कृष्ण द्रौपदी को अपना बहन मानते थे। शिशुपाल के वध के बाद अंगुली काट जाने से कृष्ण के अंगुली से रक्त प्रवाह हो रहा था।  यह देख कर द्रौपदी ने अपने साड़ी के किनारे से कपडे के टुकड़े फाड़ कर उस पर बाँध दिया था। कृष्ण ने इसे अपने ऊपर द्रौपदी  का ऋण समझ और बंधन के एक एक धागे का ऋण चुकाने का निश्चय किया। जब समयआया तो द्रौपदी चीरहरण के समय कृष्ण ने रजस्वला द्रौपदी का चीर बनकर उसके लाज की रक्षा किये।

द्रौपदी के रक्षा सूत्र ने उसकी लाज की रक्षा की अतः सभी बहने अपने भाई से इसी तरह अपनी रक्षा की कामना रखती हैं और भाई के कलाई पर राखी बांधती हैं।

4) संतोषी माँ की कथा

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गणेश  जी के दो बेटों थे , शुभ और लाभ। रक्षाबंधन के अवसर पर गणेश जी की बहन गणेश जी से मिलने आयीं  और  गणेश की कलाई पर राखी बांध दिया। दो लड़के शुभ और लाभ बहुत निराश हुए क्योंकी   रक्षाबंधन का जश्न मनाने के लिए उनकी कोई बहन नहीं थी। उन्होंने पिता गणेश से अपने लिए एक बहन की याचना की लेकिन गणेश जी ने उनकी नहीं सुनी।

अंत में, संत नारद जी भगवान गणेश से मिलने आये और गणेश जी को बेटी के महत्व के बारे में बताया नारद जी के बात से गणेश जी सहमत हुए। गणेश जी ने अपने दोनों पत्नियों ऋद्धि और सिद्धि के शरीर से निकली पवित्र  ज्वाला से एक लड़की को उत्पन्न किया। इस कन्या संतोषी माँ के नाम से जानी गयी।  संतोषी माँ ने शुभ और लाभ के कलाई पर राखी बाँधी।

 

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